कोल्हान की पहचान क्या है?

कोल्हान की पहचान क्या है? क्या यह पहचान सड़कें हैं? या बिजली, पानी या कुच्छ और? पृथ्वी की उत्पत्ति के पश्चात् पत्थर युग में ही आदिवासी समाज ने खेती बारी जमीन में प्रवेश किया। यहीं से म: नम चलू: नम वोंगा बुरु (देवी देवताओं) को खुश करने वास्ते बलि देकर पूजा पट किया गया, जिसमें आदिवासिओं या उस समय के अनार्यों ने आदि संस्कृति एवं अध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित सामाजिक रीती-रिवाज के दैविक सिद्दांत को अपनाया। यह पुर्णतः प्रकृति की पूजा रही है या कहें प्राकृतिक देन रही है। भारतीये संविधान में यही आदिवासी अनुसूचित जनजाति में दर्ज होकर हैं। हम जानते हैं की मनुष्य का जीवन ईश्वरीय देन है और सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य प्राकृतिक अवस्था में रहता था। इस जीवन को पार करने में एक पुरूष लुकू हदम और एक स्त्री लुकुमी बुदी ने अपनी सुरक्षा के लिए आदि संस्कृति एवं आध्यात्मिक ज्ञान पार आधारित सिद्धांत को अपनाया और इस सिद्दांत के अनुसार वोंगा बुरु, सेवाषादा, देसौली, जयरा, पउई, हातू गैन्शिरी, मंग्बुरु, गोवाँ वोंगा, बुरु वोंगा, गुरु वोंगा, नागे एरा-विंदी एरा एवं हर बोंगा को मानाने के बाद सुरक्षित रहने लगा और एक निश्चित उद्देश्य से मिलन हुए थे, जिसे दांपत्य जीवन कहते हैं। इस दांपत्य जीवन की परिधि में संतान की उत्पति हुई। इस तरह एक पुरूष-स्त्री और संतान के मिलने से एक परिवार का निर्माण हुआ और धीरे-धीरे परिवार की संख्या बढ़ने लगी। एक परिवार कई परिवारों में बाँट गए और कई परिवारों ने मिलकर एक समाज का निर्माण किया। आदिवासी समाज ने साथ अधीन रहने के लिए ३२ समुदायों के और भी परिवार के लोग स्वीकार किए जैसे-महाली, कमर, गौ, पेंयाय, कुंकल, डोम, गहंसी, मोची, सकरा, पतिकर इत्यादि सभी ने समाज का निर्माण किया और सुरक्षित रहने लगे।
कोल्हान के आदिवासिओं की इसी प्रचलित आदि संस्कृति एवं आध्यात्मिक ज्ञान पार आधारित सामाजिक रीती-रिवाज के दैविक सिद्धांत के तहत सामाजिक, लोकतान्त्रिक, एवं पारंपरिक (कस्त्मरी लो) व्यवस्था इसकी पहचान रही है।
एक जमाना था जब लोगों ने स्वशाशन व्यवस्था के अधीन सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, नैतिक एवं सामाजिक अधिकारों को बचाय रखने के लिए उनलोगों की नजरों में एक भयानक विद्रोह जैसे भयानक आन्दोलन किया था। हमारे पूर्वजों ने उपरोक्त अधिकारों के लिए लडाई लड़ा। विलकिंसन'स रूल्स हमने लड़कर कोल विद्रोह के सैकडों वीरों की कुर्बानी से प्राप्त किया। इस लडाई के रहस्यों पार ध्यान देने से हम स्वतः ही कोल्हान की पहचान को समाज पाएंगे।
इस लडाई के कारण ही आज कोल्हान की पहचान देश और दुनिया को है, जिसमें के० सि० हेम्ब्रोम जैसे कदावर एवं जुझारू नेतृत्व के कारण आज भी कोल्हान जिन्दा है। अब सवाल उठता है यह कोल्हान किसकी लिए है? किनके सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, नैतिक, एवं सामाजिक हितों की सुरक्षा की बात हो रही है? दुर्भाग्य है हम इतने गौरवशाली अतीत के वंशज होने के बावजूद वैश्वीकरण के इस अन्धानुकरण में कहीं खो से गए हैं। वह दिन दूर नही जब हम लुप्तप्राय प्राणियों की तरह चिडियाघर या किसी खास संरक्षित क्षेत्रों की शोभा बढाएंगे।
समय के किसी भी पलों में यदि हमें उम्मीद दिखती है तो उस गौरवशाली अतीत को निचोड़ना होगा, कंगालना होगा, और अपने दैनिक जीवन शैली का हिस्सा बनाना होगा। इस कोल्हान में हो' समाज अपने सहयोगी ३२ समुदायों के साथ घुल-मिल कर रहता है, जो सभी एक वृहद् आदिवासी समाज को दर्शाते हैं।
यह क्षेत्र अपने सामाजिक न्याय की वृहद् विकेंद्रीकृत लोकतान्त्रिक, सामाजिक एवं पारंपरिक कार्यशैली के कारण प्रषिद है। यह आलिखित है, किंतु भारतीय संविधान जैसे लिखित संविधानों की प्रेरणा भूमि है। क्योंकि लिखी हुई चीजें इस दुनिया में कहीं न कहीं व्यव्हार में होती ही है, तभी उस पार क्रिया-प्रतिक्रिया एवं विश्लेषण होता है। इस तरह हमारी व्यवस्था लिखित कानूनों का जनक है, इससे इंकार नही किया जा सकता। किंतु दुर्भाग्य से इस भावना को समझने की हिम्मत आज हम सबों में क्यों देखने को नही मिलता है?
कोल्हान की कानूनी प्रक्रिया कोल्हान अदालतों के माध्यमों से ही निपटारे किए जा सकते हैं। सामाजिक कानून बरकरार रहने के कारण भारतीये दंड संहिता सिद्धांततः इस कोल्हान क्षेत्र में लागु नही होता। फिर भी आज हजारों-हजार मुकदमें चाईबासा कोर्ट में दर्ज पाए जा सकते हैं।
आदिवासिओं को अपनी शर्त पर विकास का मौका देने के लिए कोल्हान फंड के मार्फत गाँव-गाँव को स्वशासन व्यवस्था के अनुकूल विकास की एकमात्र व्यवस्था आज सरकारी योजनाओं एवं एजेंसियों के कारण दबा दी जा रही है। समय रहते नही चेते तो यह पुर्णतः समाप्त होने से हम नही रोक सकते। फिर हम अपने पूर्वजों के कुर्बानी को आदर नही दे पाएंगे। तब हम अपने आप से यह पूछ सकते हैं की क्या यह किसी सभ्य समाज का व्यवहार हो सकता है? अगर नही तो के० सी० हेम्ब्रोम के इस आन्दोलन को जन-जन का आन्दोलन (अबुआ लडाई) बनाना होगा। कोल्हान की विशिष्ट सभ्यता एवं संस्कृति को वापस बहाल करना होगा। तभी हम उन वीरों की कुर्बा से प्राप्त विल्किंसोन'स रूल्स एवं सांस्कृतिक, धार्मिक, नैतिक तथा सामाजिक अधिकारों के वारिस बनेंगे। जोवार !

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