बेमेल गठबंधन

अलग-अलग सिदान्तों पर गठित झामुमो, आजसू, एवं भाजपा, जदयू ने कांग्रेस एवं उसके सहयोगियों को एक और प्रयोग से बचा तो लिया, परन्तु खुद इस प्रक्रिया में बेमेल गठबंधन कर बैठे हैं। यह गठबंधन इसलिए भी बेमेल है की अभी से सभी सत्तादारी गठबंधन के सहयोगियों को अंदाजा हो गया है की यह सरकार ज्यादा दिन नहीं चल सकती। और इसी दर ने कम से कम समय में ज्यादा से ज्यादा कमाने के लिए नेतागण लालच से भर गए हैं। यही इच्छा से तो ब्रश्ताचार की बू आ रही है। विभागों के लिए तनातनी यही दर्शाता है की उनलोगों की नज़र में कौन सा विभाग ज्यादा मलैदर है, उसे अपने कब्जे में किया जाय। lयकीन क्या करें कमबख्त मुख्यमंत्रीजी के विशेषाधिकार में फंस जाते हैं और मोल-टोल के लिए रूठना-मनाना ही आज उच्च स्तारिये राजनीती हो गया है। कोई कहता है कमिटमेंट पूरा नहीं हुआ, तो कोई कहता है सेनिओर की अनदेखी हुई है, तो कोई अन्दर ही अन्दर घुट रहा है। यही झारखण्ड की मौजूदा सरकार है। इस सरकार के पास जनता के लिए सोचने का अभी वक्त नहीं हुआ है, क्योंकि पहले अपनी पेट पूजा फिर जनता की बरी वाली बात पर पूरा जोर चल रहा है।
झारखंडी जनता मौन होकर यह सब देखा रही है, क्योंकि हंडिया-दारू एवं दो टेक पैसे में अपने भविष्य को संवार सकने वाले वोट को इन्होने बेच दिया है, इसीलिए नैतिक तौर पर जनता के लिए मौन रहना अभी स्वाभिमान की बात हो गई है। उनकी लिए राजनीती हर पञ्च वर्ष में आनेवाला एक पर्व है जिसमें खाना पीना-पिलाना एवं वोटरों की खरीद फ़रोख्त जानवरों से भी सस्तेदामों में होती है। यह अमूल्य मानव संसाधन (वोटर) चुनाव के समय कोडियों में ख़रीदा जाता है और हंडिया-दारू के नसे में धुत झारखंडी जनता खुश रहती है की शायद यही वक्त है दो घूँट में अपनी इज्जत बेचने का। किन्तु राजनीती पार्टियों के लिए तो राजनीती वह फसल है जिसे पांच वर्षों में एक बार लगाया जाता है और अगले पांच सालों तक इसकी उपज को खाया जाता है। इसी सिद्दांत पर आज राजनीती हो रही है। जनता के लिए खाना-पीना हो गया। अब अगले पांच साल के लिए जनता ने नेताओं का फसल कट कर उनके गोदामों में दाल दिया है, जिसे राजनीती वाले लोग अगले पांच साल तक खायेंगे।
राजनीती जनता के लिए, जनता के द्वारा एवं जनता से ताल्लुक रखनेवाला होना चाहिए , किन्तु नेताओं की व्यक्तिगत इच्छा को देखते हुए jis tarah का khinchtaan जारी है उसमें इस सरकार का अगला छे महिना साँस ले पाना भी मुश्किल है। सिद्दांत विहीन राजनीती में बेमेल गठबंधन से हम कब उबरेंगे और हम कब सुधरेंगे ?

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