चाईबासा नगरपालिका - एक सच्चाई

सन 1961 को बिहार सरकार के अधिसूचना संख्या 4830 तिथि 29/05/1961 द्वारा चाईबासा नगरपालिका के अगल बगल 13 गाँव के क्षेत्र को नगरपालिका में मिलाया गया था। हमारे आदिवासी लोगों को समझने में थोडा समय लगा और सन 1969 तक में जन आन्दोलन शुरू हो गया। श्री पूर्ण चन्द्र बिरुआ (भुत पूर्व संसद सदस्य तथा भुत पूर्व वन मंत्री बिहार सरकार) को सन 1960 में चाईबासा नगरपालिका का सरकर द्वारा मनोनीत सदस्य बनाया गया था। किन्तु जब चाईबासा नगरपालिका के संविधानिक पहलुओं को जन आंदोलनों के पश्चात् उन्हें समझ में आया तो उन्होंने सरकार में इसका विरोध दर्ज किया। सरकार ने जब उनकी बात नहीं मानी तो उन्होंने 31/01/1973 को इस्तीफा दे दिया। उस समय आदिवासी हो समुदाय में नेतृत्व की घोर कमी थी, इस कारण एकमात्र योग्य नेता को खो देने के डर से चाईबासा नगरपालिका और बिहार सरकार यह बात नहीं पचा सकी, क्योंकि उनका इस्तीफा स्वीकार किया गया या नहीं आज तक इसकी सुचना उन्हें नहीं दी गई। उन्ही के शब्दों में "चाईबासा नगरपालिका क्षेत्र का विस्तार गलत, बेतरतीब, अनैतिक, गैर कानूनी तथा बिना हैसियत के है, क्योंकि यह रहस्यपूर्ण ढंग से तथा प्रभावित लोगों की इच्छा के विरुद हुआ है। इस इस्तीफा का यह प्रभाव हुआ की बिहार सरकार ने अधिसूचना संख्या 2216 दिनांक 24/07/1973 द्वारा सन 1961 की अधिसूचना को जिसके द्वारा चाईबासा नगरपालिका के क्षेत्र का विस्तार किया गया था, वापस करने की घोषणा की। सन 1975 को बिहार सरकार ने राज्यपाल के अधिसूचना संख्या 6237 ए.यु.डी.डी.तिथि 01/10/1975 द्वारा सन 1961 को चाईबासा नगरपालिका क्षेत्र में मिलाए गए क्षेत्र को हटा दिया गया। यह 13 गाँव को चाईबासा नगरपालिका क्षेत्र से निकालने का संविधानिक रूप से अंतिम आदेश होता है। यह समझ के परे है की चाईबासा नगरपालिका राज्यपाल के उक्त अधिसूचना को नजरंदाज करते हुए झारखण्ड सरकार की अधिसूचना संख्या 641 दिनांक 23/11/2005 के द्वारा चाईबासा नगरपालिका का चुनाव कराया गया। यह उल्लंघन ही नहीं बल्कि राज्यपाल के आदेश का माखोल उड़ाया गया। सरे तत्वों की निचोड़ में यह कहा जा सकता है की आदिवासियों से सम्बंधित सारे संविधानिक प्रावधान, आदेश, अध्यादेश, विनियम, कानून आदि कागजी और दिखावे के लिए मात्र रह गए हैं, यह हम आदिवासियों के साथ क्रूर मजाक है। चाईबासा नगरपालिका क्षेत्र के विस्तार की कहानी से ऐसा लगता है की आदिवासियों की जमीन जो गैर आदिवासियों द्वारा गैर कानूनी तरीके से ली जा चुकी है, इसी को बचाने के लिए यह सब दिकुओं द्वारा किया गया। ऐसे में गाँव में दो तरह का शासन व्यवस्था स्थापित हुआ, एक जो परम्पराओं से चली आ रही व्यवस्था मानकी मुंडा व्यवस्था है, तो दूसरा नगरपालिका जहाँ नागरिक आचार सहिंता लागू होती है। उपरोक्त के मद्देनजर आदवासियों को धर्म दस्तूर एवं अन्य रूढिगत परम्पराओं के अनुपालन में कई दिक्कतें होते रही है और दोनों व्यवस्थाओं पर जबरन कई बार टकराव से क्षेत्र में शांति व्यवस्था बिगडती रही है। इससे क्या यह प्रमाण नहीं हो रहा है की संविधान की व्यवस्थाएं आदिवासियों के हितों की रक्षा नहीं कर सक पा रही है? क्या ऐसा होने से आदिवासियों का विश्वास संविधान पर हो सकता है? संविधान, राष्ट्रपति तथा राज्यपाल पर आंच आने की जिम्मेदारी क्यों नहीं राज्यपाल तथा केंद्रीय सरकार पर लाया जा सकता है? अभी भी अगर राज्यपाल चाहे तो संविधान के आर्टिकल 163 तथा 5विं अनुसूची द्वारा प्रदत अधिकारों से केंद्र, राज्य तथा उच्च न्यायालय के किसी भी फैसले को जिससे आदिवासियों को क्षति पहुँचती हो अधिनियम द्वारा हटा सकती है। बसरते आदिवासी एकजुट हो जाएँ.......

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