साक्षरता के लिए मातृभाषा संस्कृति आवश्यक

पुरखों के तप से प्राप्त संस्कृति के विपरीत चलने का अर्थ है- उलट्धारा में गमन करनायह पीछे जाने की स्थिति है। विकास के सन्दर्भ में अपनी संस्कृति के त्याग का कारण हमारी संस्कृति से कट जाना ही है।
भाषा है तो संस्कृति होगी ही। क्योंकि भाषा संस्कृति की संवाहिका, संरक्षिका एवं संवर्दिका होती है। भाषा संस्कृति ही किसी राष्ट्र, राज्य व समाज ही पहचान है और उसके अस्तित्व का आधार भी। संस्कृति का उद्भव प्रकृति के अनुरूप, अर्थात भोगोलिक परिवेश के अनुकूल होता है। इसी से वन्य, पर्वतिये, रेगिस्तानी, मैदानी, जैसी संस्कृति विकसित होती है। मुल्त: संस्कृति का अविर्भाव सामाजिक विकृति से मुक्ति के लिए होता है। आदिम युगीन मानवों ने अपने दीर्घ जीवन संघर्ष के उपरांत जो जीवनमूल्य प्राप्त किया वही संस्कृति बनती गई। संस्कृति कुछ और नहीं किसी समाज के जीने की सर्वोतम कला है। कोई समाज कैसे जीता है? उसके आदर्श क्या है? उनकी मर्यादाओं का स्वरुप क्या है? उनकी जीवनशैली कैसी है? इन सब का उत्तर उनकी संस्कृति प्रदान करती है। अपनी सांस्कृतिक धारा में प्रवाहित होने का परिणाम है - असाधारण गति को प्राप्त करना। अपने देश, राज्य व समाज में हम विश्व विकास की दौड़ में पीछे क्यों हैं? इसलिए की हम अपनी संस्कृति का त्याग करते जा रहे हैं, अपनी भाषा को छोड़ते जा रहे हैं। क्यों जापान, जर्मनी, चीन, फ्रांस आदि देश विकास के शिखर पर नित चढ़ते जा रहे हैं। इसलिए की वे हमारी तरह विदेशी भाषा संस्कृति के दीवाने नहीं हैं। अपनी भाषा संस्कृति परम प्रिये होनी चाहिए। सारे ब्रह्मण भले ही हमारे देश में रह जाएँ, लेकिन ब्रह्मनियत का देश में रहना कतई बर्दास्त नहीं होना चाहिए।
प्राचीन काल में शासकों की भाषा संस्कृत एवं शासितों की भाषा प्राकृत थी। आज भी शासकों की भाषा अंग्रेजी और शासितों की भाषा देशी भाषाएँ हैं। ऐसे में दोनों में समन्यवय कैसे हो? अपने देश में साक्षरों से अधिक अनपढ़ हैं। झारखण्ड में ४६ प्रतिशत आज भी अशिक्षित हैं। इनके ज्ञान विज्ञानं की अधिकांश पुस्तकें अंग्रेजी में हैं। ऐसे में गरीब, असहाय, अशिक्षित बहुसंख्यक जनता ज्ञान विज्ञानं से परिचित हो तो कैसे? रूस जैसे विकसित देश में आज विज्ञानं की जितनी किताबें रुसी भाषा में है, दुनिया की किसी भाषा में नहीं है। रूस में हर क्षेत्रीय भाषा एवं राष्ट्रभाषा रुसी पूर्ण विकसित है और हर नागरिक अपनी मातृभाषा, राष्ट्रभाषा एवं एक विदेशी भाषा जानता है। लेकिन अपने देश में अधिकांश शिक्षित, उच्च पदस्थ एवं संपन्न व्यक्ति न तो अपनी मातृभाषा जानता है, न राष्ट्रभाषा। उसे बस एक विदेशी भाषा, गुलामी की भाषा अंग्रेजी आती है। संस्कृति की आजादी ही किसी देश को विकसित और संवृद कर सकती है। इसके लिए अनिवार्य है की हर भारतीय को अपनी मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा मिले और इसके माध्यम से राष्ट्रभाषा में प्रवेश करे और राष्ट्रभाषा में उसे उच्च शिक्षा प्राप्त हो और एक विश्व भाषा के साथ अपनी मातृभाषा व संस्कृति का एक विषय हर तरह की पढाई में अनिवार्य बना रहे, ताकि ज्ञान-विज्ञानं के हर विषय वह अपनी मातृभाषा में अपनों के लिए तैयार कर सके, जैसे जापान आदि देश करते हैं। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी उपोदयता है - समरसता, विश्व बंधुत्व एवं वसुधयो कुटुम्बकम। और झारखंडी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है- सामूहिकता, शोषण मुक्त सामाजिक व्यवस्था, समानता, आदम्वर विहीन जीवन एवं धार्मिक आस्था। सहज, सरल, सुन्दर, मधुर संगीत भरा मेहनत एवं ईमानदारी जीवन मूल्य को वह कभी समाप्त करना नहीं चाहता। इसका पालन तभी संभव है जब उसकी मातृभाषा में शिक्षा मिले ताकि उसकी उत्तम जीवनशैली की शिक्षा देने वाली संस्कृति बनी रहे।

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