साल बृक्ष का धार्मिक महत्व

आदिवासी हो/मुंडा समुदाय में साल बृक्ष का धार्मिक महत्व है। मान्यता है की इस बृक्ष में वोंगा बुरु(आदिवासी देवी देवता) वास करते हैं। इस बृक्ष से निकलने वाला रस(जैर) को दुणा कहते हैं। दुणा का सुगंध वोंगा बुरुओं को बहुत भाता है और दूर से भी इसकी सुगंध से हमारे घर आंगन को चले आते हैं। वोंगा बुरु को सेवा करने का असली चीज दुणा ही होता है। किन्तु आज उसके जगह पर लोग अगरबत्ती इस्तमाल करते हैं, जो सही तो नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वोंगा बुरु को शायद ठगा तो नहीं जा सकता। हमारे आदिवासी देवी देवता सही धर्म अनुष्ठान नहीं पाने के कारण हमलोगों को छोड़ रहे हैं, जिस कारण पाप और दुखों से हम लदे पड़े हैं। साल के बृक्ष में बहुत बड़ी शक्ति है। इसीलिए साल के पत्तों में चावल एवं सिंदूर से ग्रह आदि खोजने पर तुरंत ही मिल जाते हैं। अन्य बृक्ष के पत्तों में यह गुण नहीं है। साल या सर्जोम(हो में) ही आदिवासियों के धर्म का सबसे पूज्य एवं राजा पेड़ है। इसी बृक्ष में मंग्बुरु देशाउली का वास होता है।
साल बृक्ष के सभी चीजों में गुण होता है और सभी आदिवासी धर्म दस्तूर में काम आते हैं। साल का पत्ता में वोंगा बुरु(पूजा पाट) किया जाता है, सोमरस(रासी) अर्पण किया जाता है, प्रसाद दिया जाता है और साल के पत्तों में आदिवासी समाज सभी पूज्यनीय कामों में खाना खाता है। इसे सिर्फ एक बार इस्तमाल किया जाता है, पवित्र है, इसीलिए इसे सोने की थाली भी कहा जा सकता है। साल के पत्तों में बांध कर बनाया गया भोज्य पदार्थ का स्वाद प्राकृतिक गुणों से भरपूर होता है। जैसे मांस, या मछली, या अन्य खाने की चीज आदि को साल के पत्तों में बांध कर पकाने से साल का गुण भी आ जाता है और स्वादिष्ट हो जाता है। इस बृक्ष के तना, लकड़ी, पत्ता, फूल, फल, और तना से निकलने वाला रस दुणा सभी हम आदिवासियों के बहुत काम आता है। साल बृक्ष के फूल का ही बहा पर्व में पूजा उपासना में उपयोग होता है। साल का बृक्ष इस दुनिया का सबसे पूज्य एवं बड़ा मान सम्मान का बृक्ष है। इतना ही नहीं यह बृक्ष हवा को साफ करने में भी अन्य बृक्षों से कहीं आगे है, किन्तु दुनिया को इसकी जानकारी नहीं है। दुणा से बायुमंडल का ओजोन परत भी ठीक हो सकता है, जिसपर शोध किया जा सकता है। साल के बृक्ष के नीचे बैठक करने, पढने, या कोई भी काम जो नहीं हो रहा है करने से प्राकृतिक लाभ से इंकार नहीं किया जा सकता है। उदहारण स्वरुप साल बृक्ष के गुणों को जानने के बाद गौतम बुद्द ने भी इसी बृक्ष के नीचे जीवन छोड़ा। संथाल हूल की शुरुआत के समय सिद्दू कान्हू ने भी साल बृक्ष के तनों को लेकर लोगों को एकजुट किए थे। इसीतरह बिरसा मुंडा ने भी साल बृक्ष से ही लोगों को एकजुट किए थे। अकाल आदि के समय आदिवासी समाज इसी के फल को खाकर अपनी जीवन बचाय थे। इस तरह साल बृक्ष आदिवासी धर्म, संस्कृति, एवं अध्यात्म का बृक्ष है और यह श्रृष्टि का महानतम देन है।

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