आदि धर्म सरना की प्राकृतिक आस्था ...

जिस प्रकार एक हाथ में पांच अंगुलियाँ होती है, उसी प्रकार आदिवासी समाज में सिंगवोंगा, हाम हो दूम हो एवं गुरुवीर के अलावे मुख्य रूप से पांच वोंगा बुरुओं (आदिवासी देवी देवताओं) का आराधना प्रमुख रूप से किया जाता है, जिन्हें पूर्णत: प्राकृतिक आदि शक्तियों के रूप में माना जाता हैठीक इसी प्रकार ईश्वर उपासना के साथ साथ गोरम गैशिरी(संस्थापक/ग्रामदेव) देशाउली(ग्रामदेवता), पौणि(बुरु बोंगा/वनदेव), जयरा (नारीशक्ति/ग्रामदेवी), गोवन बोंगा(रक्षा देव) हाम हो-दूम हो को (इष्ट देवगण), गुरुवीर को (गुरु देव), नागे एरा-बिंदी एरा(जल के देवी देवता) इत्यादि प्राकृतिक शक्तियों का उपासना किया जाता है। यह गर्व की बात है ही आदिवासी समाज पूर्ण रूप से प्राकृतिक शक्तियों का उपासना करता है। हमारे पर्व त्योहारों एवं धर्म दस्तूरों के विधि विधानों को मानने से कोई भी प्रदुषण नहीं होता है और न ही इसके लिए कोई सरकारी सहयोग की जरुरत होती है।
सिञवोन्गा: सिञवोन्गा अदृश्य अमर शक्ति को कहते हैं। सिंग्वोंगा प्राकृतिक स्थिति के तीन कर्म व रूपों को प्रत्यक्ष रूप में देख पाने को ही मानते हैं। पहला सृष्टिकर्म, दूसरा पालनकर्म, एवं तीसरा संहारकर्म(Generator=सृष्टिकर्ता, Oprator=पालनकर्ता, एवं Distroyer=संहारकर्ता =GOD(सिंग्वोंगा)। जिस तरह जब हम किसी भी कार्य को करते हैं तो सबसे पहले शून्य/निष्क्रिय(Neutral) से शुरू करते हैं। उसी तरह कार्यों को करने से पहले का सर्वप्रथम श्रेय व आस्था सर्वशक्तिमान रूपी (supreme power) को जाता है, क्योंकि इनमे सभी प्रकार की क्रिया-प्रतिक्रिया को करने की शक्ति एवं क्षमता होती है। हो समाज भगवान को सिञवोन्गा के रूप में मानता है। और यह सिञवोन्गा प्रकृति की असीम शक्ति को दर्शाता है। सिञवोन्गा 'हो' भाषा के तीन शब्दों के मिलन का एक नाम है सिञ + बू + ओंगाह। सिञ ऋणात्मक शक्ति है, ओंगाह धनात्मक शक्ति है और बू इन दोनों शक्तियों का कर्म स्थल है। इस तरह नर और नारी के मिलन के रूप में सिञवोन्गा 'हो' समाज में असीम शक्ति के रूप में पूज्यमान है। आदिवासी 'हो' समाज के दर्शन के अनुसार नर और नारी ही पूजा उपासना के केन्द्र विन्दु है। नर धनात्मक पक्ष का द्योतक है और नारी ऋणात्मक पक्ष का। इन दोनों का मिलन ही सिञवोन्गा की परिकल्पना को दर्शाता है। जिसे 'हो' समाज या समुदाय सिञवोन्गा के रूप में मानता है, उपासना करता है।

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