हाम हो-दूम होको(हो समाज के देवी देवता)

प्रत्येक आदिवासी हो घरों में एक विशेष पूर्णवर्जित एवं प्रवेश निषेध वाला कमरा होता है, जिसे आदिंग कहते हैं। उस आदिंग में ही अपने पूर्वजों एवं मृत व्यक्तियों के आत्माओं को स्थापित किया जाता है, जिसे हम हाम हो-दूम हो के नाम से पूजते हैं। हाम हो-दूम हो को ही हाम घर के इष्टदेव मानते हैं, ये देवी देवताओं तक पहुँचने का सरल, सफल, उचित व प्रथम सीढ़ी होते हैं। घर से नित्य प्रतिदिन हाम हो-दूम हो की आराधना व जाप मात्र के पश्चात् ही कहीं निकलने पर कोई भी अप्रिय दुर्घटनाओं एवं कष्टों को टाला जा सकता है। इस विधि में घर के पूर्वजों(स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त) मृत शुद आत्माओं को आह्वान कर अपनी सुख समृधि के लिए मन्नतें व प्रार्थनाएं की जाती है। आदिवासी हो समुदाय में स्वर्ग एवं नरक का सिद्दांत नहीं होता बल्कि मरने के उपरांत उन्हें इसी आदिंग में पुन: "रोवा क्या अदेर" विधि के तहत वापस बुलाया जाता है। मृत्यु उपरांत यही उनका घर होता है और प्रतिदिन आदिंग में खाना पकने के बाद सर्वप्रथम उन्हें ही खाना दिया जाता है और तब घर के लोग खाते हैं। आदिंग में शुद्द आत्माओं का ही "रोवा क्या अदेर" होता है। यानि जिनका स्वाभाविक मृत्यु होता है उन्हीका। जिनकी मृत्यु दुर्घटना में, या बिजली कड़कने आदि के कारण हुई है उन्हें किसी पेड़ या अन्य जगहों में जगह दिया जाता है। 'हाम हो-दूम हो' की नियमित सेवा से वे हमेशा हमारा साथ देते हैं और विषम परिस्तिथियों में भी हमें सुरक्षित एवं सफल बनाते हैं। प्रतिदिन खाने से पूर्व उनके नाम से खाना आदि थाली किनारे देने का प्रचालन हो समाज के धर्म दस्तूरों में एक है।

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