भूमि अधिग्रहण और आदिवासी ग्राम सभा...



आदिवासियों की अपनी पारंपरिक ग्राम सभा होती है. यह ग्राम सभा आदिवासियों की परम्पराओं और रूढ़ियों, हमारी सांस्कृतिक पहचान, सामुदायिक संपदाओं और विवाद निपटान के रुढिक ढंग का संरक्षण और परिरक्षण करती है. इस ग्राम सभा में गैर आदिवासी जो गाँव में नहीं रहता है का कोई अधिकार नहीं होता है. वास्तव में इस ग्राम सभा को यह निर्णय लेने की ताकत दी जानी चाहिए की कोई परियोजना जनहित में है या नहीं और इसके लिए जमीन देनी है या नहीं. अगर जमीन देनी है तो किन शर्तों पर देनी है, इस पर ग्राम सभा का निर्णय ही अंतिम हो. यदि कोई कंपनी या केंद्र/राज्य सरकार किसी गाँव की जमीन अधिग्रहण करना चाहती है तो वह उस गाँव की ग्राम सभा में इसके लिए आवेदन दे. कंपनी या केंद्र/राज्य सरकार को यह बताना होगा की उस जमीन का क्या किया जायेगा और उस पर क्या प्रोजेक्ट लगाया जायेगा. इससे सम्बंधित सारे मूल दस्तावेजों की प्रतियाँ स्थानीय भाषा में अनुवाद के साथ प्रभावित गांवों को भेजना होगा. इससे उस गाँव के लोग प्रोजेक्ट से जुड़े हर पहलु को जान सकेंगे. ग्राम सभाएं अपने अपने गाँव में इन कागजों के आधार पर अपनी जागरूकता फैला सकते हैं. ग्राम सभा को सारे कागज मुहैया करने के दो महीने के अन्दर ग्राम सभा में उस प्रोजेक्ट पर चर्चा होगी. यदि ग्राम सभा को कुछ प्रश्न या शंकाएं हों तो आवेदन करने वाली कम्पनी या केंद्र/राज्य सरकार को पत्र लिखकर उन्हें कहना होगा की ग्राम सभा की अगली मीटिंग में किसी जानकर अधिकारी को भेजें. ग्राम सभा की कीटिंग में अधिकारी से जनता सवाल जवाब करेगी. लेकिन इस ग्राम सभा में जमीन के सम्बन्ध में निर्णय नहीं होगा. अधिकारी द्वारा दिए गए उत्तरों और कागज पत्रों से यदि ग्राम सभा संतुष्ट हों तो अंतिम निर्णय के लिए एक और ग्राम सभा बुलाएगी. अगर ग्राम सभा संतुष्ट न हो तो वह कंपनी केंद्र/राज्य सरकार को लिखकर और जानकारी मांग सकती है. कंपनी या केंद्र/राज्य सरकार को जमीन दें या नहीं इस पर अंतिम निर्णय लेने के लिए ग्राम सभा की अलग मीटिंग बुलाई जाएगी. अंतिम निर्णय वाली इस ग्राम सभा में बाहर का कोई व्यक्ति या अधिकारी मौजूद नहीं होगा. पुलिस भी नहीं होगी. मिडिया दूर से केवल देख सकती है. इस ग्राम सभा की अध्यक्षता पारम्परिक प्रधान ही करेंगे. मीटिंग का मिनट्स लिखा जायेगा. गाँव के लोग गाँव के किसी व्यक्ति से लिखवायेंगे. इस ग्राम सभा में आम सहमति से यह तय होगा की गाँव के लोग जमीन देना चाहते हैं या नहीं और देना चाहते हैं तो किन शर्तों पर. आम सहमति बनाते वक्त  ग्राम सभा सभी लोगों के हितों का उचित ख्याल रखेगी. आवश्यकता हो तो एक से अधिक गाँव की संयुक्त बैठक भी आयोजित की जा सकती है. ग्राम सभा का यह निर्णय अंतिम होगा. इसे कोई सरकार न तो रद्द कर सकेगी और न ही इसमें कोई बदलाव कर सकेगी. यदि कोई ग्राम भूमि अधिग्रहण के लिए तैयार होती है तो पुनर्वास नीति में लिखे प्रावधान लोगों के न्यूनतम अधिकार होंगे. पर यदि ग्राम सभा चाहेगी तो इससे अधिक मांग करने के लिए स्वतंत्र होगी.  ग्राम सभा का निर्णय अंतिम निर्णय होगा. आने वाले समय में देश में खाद्य संकट गहरा सकता है इसलिए जरुई है कि देश की उपजाऊ भूमि का खेती के लिए ही इस्तेमाल हो. सड़क, बिजली और कारखाने के बिना तो देश का काम चल जायेगा पर खाना के बिना हमारा काम एक दिन भी नहीं चलेगा. इसलिए यह कानून में डाला जाय कि जिस भूमि पर एक या एक से अधिक फसलें निकलती है ऐसी भूमि को ग्राम सभा में चिन्हित किया जाय. ऐसी भूमि को किसी भी हालात में कृषि के आलावा किसी भी दूसरे उपयोग में नहीं लाया जाए. भूमि सम्बन्धी सभी दस्तावेजों की देख रेख व उन पर कार्य ग्राम सभा के अधीन होने चाहिए. सदियों से लोग प्राकृतिक संसाधनों का सीमित उपयोग करते थे और उनके संरक्षण की जिम्मेदारी भी उठाते थे. अंग्रेजों के जमाने से नदी, जंगल, खदान आदि पर सरकारों का नियंत्रण शुरू हुआ. अंग्रेजों के समय से ही प्राकृतिक संसाधनों का जमकर शोषण शुरू हुआ और स्थानीय लोगों को विस्थापित किया जाने लगा. आजादी के बाद भी यह प्रक्रिया जारी रहा. पिछले कुछ वर्षों से आदिवासियों को विस्थापित कर प्राकृतिक संसाधनों के शोषण में भारी तेजी आई है. हमारी सरकारें तेजी के साथ औने पौने दामों में प्राकृतिक संसाधनों को ठेकेदारों और कंपनियों को बेच रही है. वास्तव में ग्राम सभा अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी संसाधनों का मालिक है, इसे स्वीकार किया जाए. ग्राम सभा यह फैसला करें कि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन ही अनुमति दी जाए या नहीं और दी जाए तो किन शर्तों और नियमों के साथ. अगर इन शर्तों का भविष्य में उल्लंघन हो तो ग्राम सभा को यह अधिकार हो कि दोहन के लिए दी गई अनुमति को निरस्त कर दे. ऐसी व्यवस्था में पर्यावरण एवं समुदाय को हुए नुक्सान के लिए सम्बंधित उद्द्योगिक इकाई की ओर से क्षतिपूर्ति की जाएगी. सारे प्राकृतिक संसाधन का राष्ट्र और जनहित में कैसे प्रयोग हो इस बारे में देश भर की ग्राम सभाओं में चर्चा के बाद राष्ट्र स्तर की नीतियाँ बने. भविष्य में अपने इलाके में किसी भी योजना के लिए ग्राम सभाएं इन नीतियों के अनुरूप अनुमति दें.
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